मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

कल्प वृक्ष

कल्प की मैं छांव बैठा कर रहा था कल्पना |
क्या ये मेरी कल्पना को सत्य ही पूरा करेगा ||

कल्प के किस्से तो नानी से बहुत पहले सुने थे |
स्वप्न था बस पक्षी बनना, और गगन में मगन रहना |
तब मेरी बस सोच यह थी, हर्ष इसमें ही निहित है ||

कल्प की मैं छांव बैठा कर रहा था कल्पना |
क्या ये मेरी कल्पना को सत्य ही पूरा करेगा ||

कल्प के बारे में पुस्तक में कभी मैंने पढ़ा फिर |
स्वप्न था बस विजय प्राप्ति, शिक्षा और हर छेत्र में |
तब मेरी बस सोच यह थी, पित्र सुख इसमें निहित है ||

कल्प की मैं छांव बैठा कर रहा था कल्पना |
क्या ये मेरी कल्पना को सत्य ही पूरा करेगा ||

कल्प का साक्षात दर्शन बड़ा ही विस्मय भरा था |
सत्य की अनुभूति थी, अभिव्यक्ति करना पर कठिन |
तब मेरी बस सोच यह थी, सर्व सुख इसमें निहित है ||

कल्प की मैं छांव बैठा कर रहा था कल्पना |
क्या ये मेरी कल्पना को सत्य ही पूरा करेगा ||

कल्प से साक्षात्कार में स्वप्न सारे कह दिए |
स्वप्न के अब कलश पर, बस तिलक भर की देर थी |
कलश टूटा स्वप्न का, और एक वृक्ष नज़र आया ||

कल्प की मैं छांव बैठा कर रहा था कल्पना |
क्या ये मेरी कल्पना को सत्य ही पूरा करेगा ||

कल्प स्वयं एक कल्पना है सत्य किंचित भर नहीं |
अब मेरा यह स्वप्न है कि, कल्प सच्चाई बने |
मनुजता के स्वप्न सारे, सहज ही पूरे करे ||

अब मेरी यह सोच है कि |
सृष्टि का कल्याण हो ||
स्वर्ग का बहुत हो चूका |
कुछ पृथ्वी का उत्थान हो ||


टिप्पणी : कल्प का अर्थ कविता में कल्प वृक्ष से लिया गया है |

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