रविवार, 27 अक्टूबर 2013

स्वप्न

कल देखा मैंने एक सपना
सपने में था कोई अपना |
मैंने सोचा हाथ बढा कर
क्यों न सारी बातें कर लूं ||

स्वछन्द हृदय के सब मोती
लब से अल्फाजों में भर लूं |
उनसे सुन्दर दो कुंडल रच कर
शोभित करनो में कर दूं ||

झील सी उनकी आँखों से
कुछ प्याले पियूष के भर लूं |
हिरनी से चंचल नैना दो
मन भित्ति पे चित्रित मैं कर लूं ||

पाजेब की हर छम छम को मैं
अपने कानों में ही भर लूं |
मन्मथ के सर का चाप समझ
हर वार हृदय पर ही बस लूं ||

हर बार यूँही कर व्यंग कोई
अधरों पर तेरे हंसी भर दूं |
दो सुर्ख तेरे गालों को मैं
जी भर कर हँसता देख तो लूं ||

तू रूठ न जाए इस डर से
स्पर्श नहीं मैं करता हूँ |
जुल्फों की तेरी छांव तले
दो बातें भी न करता हूँ ||

सपना न टूटे इस डर से
आंखे मूंदी ही रखता हूँ |
पर सोच तुझी से मिलना है
निर्दयता से फिर उठता हूँ ||

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

adbhut.. dil ko chuu lene wali kavita h gaurav ji... Keep Writing

Unknown ने कहा…

Wah bete....Shringaar Ras pe aagaye tum bhi.
Main kahin kavi na ban jaaun.... ;)