निकल पड़े थे राष्ट्र के हित में,
करने बड़े बड़े हम काम |
फँस गए भैय्या घर ही में,
जब बचे दिखे ढेरों थे काम |
सोचा झंडा लहराएंगे लाल किले पर हम एक दिन,
समझ न पाए बाकी ही हैं घर में लक्ष्य अभी अनगिन |
कुछ अनपढ़, कुछ रोज़गारहीन,
कुछ धन की कमी कुछ प्रयत्नहीन |
सबमें हैं कुछ गुण विद्यमान,
अवगुण करते पर व्यर्थ काम |
संयम है, तो फिर धन की कमी,
धन है तो संयम आप नहीं |
संयम धन दोनों मिला जिन्हें,
अभिमान भी बैठा मुफ्त वहीँ |
संवेदनशील तो हम थे ही,
भावुकता से थे दूर बड़े |
भावुकता ने पर पकड़ लिया,
घर के कामों में जकड़ लिया |
झंडा फहराने की हसरत,
आँगन में जाकर सिमट गई |
माथे की रेखा घिस घिस कर,
दफ्तर से घर तक सिमट गई |
नोटों के थे अम्बार लगे,
घर आँगन में उल्लास जगे |
पर अब भी तो एक कोने में,
अंधेरा सा तो बाकी था |
वो कोना मेरा दिल ही था,
उजियारा करना बाकी था |
गर सबको बस यह ध्यान रहे,
अपने गुण का बस ज्ञान रहे |
तब बोझ कहीं बाकी न बचे,
सब सक्षम हों अपने भर के |
शायद तब झंडा लहराए,
हाँ राष्ट्र के हित में सचमुच ही |
मेरी अभिलाषा खुद पूरी हो,
जब खुश हो हर घर आँगन ही |
करने बड़े बड़े हम काम |
फँस गए भैय्या घर ही में,
जब बचे दिखे ढेरों थे काम |
सोचा झंडा लहराएंगे लाल किले पर हम एक दिन,
समझ न पाए बाकी ही हैं घर में लक्ष्य अभी अनगिन |
कुछ अनपढ़, कुछ रोज़गारहीन,
कुछ धन की कमी कुछ प्रयत्नहीन |
सबमें हैं कुछ गुण विद्यमान,
अवगुण करते पर व्यर्थ काम |
संयम है, तो फिर धन की कमी,
धन है तो संयम आप नहीं |
संयम धन दोनों मिला जिन्हें,
अभिमान भी बैठा मुफ्त वहीँ |
संवेदनशील तो हम थे ही,
भावुकता से थे दूर बड़े |
भावुकता ने पर पकड़ लिया,
घर के कामों में जकड़ लिया |
झंडा फहराने की हसरत,
आँगन में जाकर सिमट गई |
माथे की रेखा घिस घिस कर,
दफ्तर से घर तक सिमट गई |
नोटों के थे अम्बार लगे,
घर आँगन में उल्लास जगे |
पर अब भी तो एक कोने में,
अंधेरा सा तो बाकी था |
वो कोना मेरा दिल ही था,
उजियारा करना बाकी था |
गर सबको बस यह ध्यान रहे,
अपने गुण का बस ज्ञान रहे |
तब बोझ कहीं बाकी न बचे,
सब सक्षम हों अपने भर के |
शायद तब झंडा लहराए,
हाँ राष्ट्र के हित में सचमुच ही |
मेरी अभिलाषा खुद पूरी हो,
जब खुश हो हर घर आँगन ही |
2 टिप्पणियां:
🙏🙏👍👍
कवि परिपक्व होता जा रहा।
यूही लिखते रहो,
जबर्दस्त कविता
एक टिप्पणी भेजें