रविवार, 14 अक्टूबर 2018

राष्ट्र हित में

निकल पड़े थे राष्ट्र के हित में,
करने बड़े बड़े हम काम |
फँस गए भैय्या घर ही में,
जब बचे दिखे ढेरों थे काम | 

सोचा झंडा लहराएंगे लाल किले पर हम एक दिन,
समझ न पाए बाकी ही हैं घर में लक्ष्य अभी अनगिन | 
कुछ अनपढ़, कुछ रोज़गारहीन,
कुछ धन की कमी कुछ प्रयत्नहीन |
सबमें हैं कुछ गुण विद्यमान,
अवगुण करते पर व्यर्थ काम | 

संयम है, तो फिर धन की कमी,
धन है तो संयम आप नहीं | 
संयम धन दोनों मिला जिन्हें,
अभिमान भी बैठा मुफ्त वहीँ | 

संवेदनशील तो हम थे ही,
भावुकता से थे दूर बड़े |
भावुकता ने पर पकड़ लिया,
घर के कामों में जकड़ लिया | 

झंडा फहराने की हसरत,
आँगन में जाकर सिमट गई | 
माथे की रेखा घिस घिस कर,
दफ्तर से घर तक सिमट गई |

नोटों के थे अम्बार लगे,
घर आँगन में उल्लास जगे | 
पर अब भी तो एक कोने में,
अंधेरा सा तो बाकी था | 
वो कोना मेरा दिल ही था,
उजियारा करना बाकी था | 

गर सबको बस यह ध्यान रहे,
अपने गुण का बस ज्ञान रहे | 
तब बोझ कहीं बाकी न बचे,
सब सक्षम हों अपने भर के | 

शायद तब झंडा लहराए,
हाँ राष्ट्र के हित में सचमुच ही | 
मेरी अभिलाषा खुद पूरी हो,
जब खुश हो हर घर आँगन ही | 

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

🙏🙏👍👍

Unknown ने कहा…

कवि परिपक्व होता जा रहा।
यूही लिखते रहो,
जबर्दस्त कविता