रविवार, 19 जून 2016

है कर्म यही

एक कलम लगी कागज़ के कुछ, पन्नो पर |
आकृतियां रचने ||
अविरल थी वो, स्फूर्तिमान |
अद्भुत था उसका कला ज्ञान ||

थम के वह सांस जरा लेले |
यह सोच रहा, विस्मित समान ||
उसकी रचना की दरस मिले |
व्याकुल निर्मम, मर्मित सामान ||

झोंका ही हवा का आ जाए |
स्याही ही कुछ कम पड़ जाए ||
कोई बिजली बारिश कुछ तो हो |
अब आकर रोड़ा बन जाए ||

आह ! श्वास थमी, वह कलम रुकी |
बाजु में जाकर लेट गई ||
थक गई हो जैसे, शिकन नहीं |
न हर्ष कहीं, न दर्द कहीं ||

गुण दंभ नहीं, अभिमान नहीं |
किंचित भर, अहंकार नहीं ||
न पाप कहीं, न पुण्य कहीं |
है कर्म यही, है कर्म यही || 


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