विवाह से ठीक पहले मेरे मन में एक कविता लिखने की इच्छा जगी| परन्तु मेरी वह मनोदशा मुझे मेरी इच्छा अनुसार प्रेरणा प्रदान नहीं कर पा रही थी| अंततः मुझे यह विचार आया की क्यों न इसी दुविधा के एहसास को कविता का रूप प्रदान किया जाए| इसी मनोदशा को कविता के रूप में प्रस्तुत करने का मेरा एक प्रयास है |
व्याकुल हृदय में चिन्तनों के |
उठ रहे उद्गार हैं ||
चित ये स्थिर है नहीं |
चीखते सब विचार हैं ||
निर्मम को फिर भी देखिये |
बैठे हैं मन के द्वार पे ||
ओस की बूंदे हैं चुनते |
दोपहर के ताप में ||
एक कोना हो तो पकडूँ |
लिख दूँ उसी पर पंक्तियाँ ||
दिल के हर कोने में आतुर |
वात्सल्य भय श्रृंगार हैं ||
हर्ष करुणा खो गए |
मेरी नसों के ज्वार में ||
वीर फिर भी लड़ रहे |
विभत्सता की आग में ||
भाव सब उलझे से हैं |
सुलझती न गुत्थियाँ ||
ध्येय पर राधेय का तो |
एक बस वह पार्थ है ||
और फिर जाने ये अवसर |
फिर मिले या न मिले ||
द्वन्द जब आपस में करते |
रस छंद और अलंकार हैं ||
इस त्रिवेणी पर जो संगम |
आज मैंने कर लिया ||
रण में शोडित दान कर |
अज्ञानता को तज दिया ||
लिख नहीं पाया भी तो |
निखरेंगी मेरी अस्थियाँ ||
और एकदिन फिर सजेंगी |
प्यार की कुछ पंक्तियाँ ||
व्याकुल हृदय में चिन्तनों के |
उठ रहे उद्गार हैं ||
चित ये स्थिर है नहीं |
चीखते सब विचार हैं ||
निर्मम को फिर भी देखिये |
बैठे हैं मन के द्वार पे ||
ओस की बूंदे हैं चुनते |
दोपहर के ताप में ||
एक कोना हो तो पकडूँ |
लिख दूँ उसी पर पंक्तियाँ ||
दिल के हर कोने में आतुर |
वात्सल्य भय श्रृंगार हैं ||
हर्ष करुणा खो गए |
मेरी नसों के ज्वार में ||
वीर फिर भी लड़ रहे |
विभत्सता की आग में ||
भाव सब उलझे से हैं |
सुलझती न गुत्थियाँ ||
ध्येय पर राधेय का तो |
एक बस वह पार्थ है ||
और फिर जाने ये अवसर |
फिर मिले या न मिले ||
द्वन्द जब आपस में करते |
रस छंद और अलंकार हैं ||
इस त्रिवेणी पर जो संगम |
आज मैंने कर लिया ||
रण में शोडित दान कर |
अज्ञानता को तज दिया ||
लिख नहीं पाया भी तो |
निखरेंगी मेरी अस्थियाँ ||
और एकदिन फिर सजेंगी |
प्यार की कुछ पंक्तियाँ ||
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