संवाद की शुरूआत थी ।
क्या है सही यह बात थी ।।
कब विवाद में उलझ गए ।
कौन है सही में फंस गए ।।
रिश्ते ही थे जाने ये कब ।
तुम और मैं में बंट गए ।।
खुश थे बड़े सब साथ हैं।
अब ना बड़े ना आप हैं ।।
सब भान है हमको मगर।
हमसे बड़ा अभिमान है ।।
लोहित पियेंगे हम मगर ।
मानेंगे ना यह पाप है ।।
है चक्रव्यूह खुद का रचा ।
श्री कृष्ण ना अब पार्थ हैं ।।
अभिमन्यु होने का हमें।
किंचित नहीं अभ्यास है ।।
संयम, स्वयं, साधू वचन ।
सम्मान, सत् , स्वाभिमान, सम ।।
इन सब से मैं तो दूर हूँ ।
खुद से बना मैं क्रूर हूँ ।।
मस्तक में दूषित अहम् की
रज्जु स्वतः धारण करो ।
चिंतन करो मंथन करो ।
शीतल सरल तन मन करो ।।
तुम ब्रह्म की आभा हो एक ।
हर ब्रह्म को तुम नत करो ।।
बन के नदी धारा यूँही ।
निःस्वार्थ बस बहते रहो ।।
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