स्वयं में धारण किये,
नवग्रह, अनेकों क्षुद्र ग्रह ।
पिता की भांति सजग हो,
कर रहा वो यात्रा ।
धरा से सुन्दर, कभी क्रोधित
भी दिखता है हमें ।
ध्रुवों पर दुर्लभ, कभी
छः मास तकता, क्षितिज से ।
मार्तण्ड और अरूण से,
उसमें रूप अनेकों ।
आदिभूत अखिलज्ञ दिवाकर
रूग्घन्त्र सब देखो ।
छवियां हैं सब अपनी,
अपने समय और स्थल की ।
उसके परिवर्तन की अबतक,
कोई छवि न उतरी ।
ठण्डक है उसके भी दिल में,
रोष नहीं है कोई ।
पल में ही जीता है वो,
ना लक्ष्य हृदय में कोई ।
नश्वर है, वह भी ईश्वर की,
रचना एक निरंतर ।
ये जन्मा वो मरा,
नहीं है इनमें कोई अन्तर ।
किसी द्वार पर स्वागत है,
कहीं रोष है लाता ।
कर्म यूँही अपना करता,
वह पाप पुण्य न पाता ।
इसको न मुक्ति की मांग है,
न माया का मोह ।
जीवन के छंदों में है,
वह एक सरगम निर्मोह ।
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