स्थान काल में छवियां सबकी,
होती एक अनेक ।
उन्हीं किसी में क्रोध नाम का,
होता है एक भेष ।।
क्रोध नहीं है विषय
खेद, द्वेष, चिंतन का ।
अलग नहीं अस्तित्व
धरा है तुमने वेष इसी का ।।
क्रोध नहीं है बाधा
ना ही इसका अपना रूप ।
अहम् की माटी में पलता
पाता यह उग्र स्वरूप ।।
करो क्रोध को धारण
तुम बनो नहीं खुद भोग ।
अचरज नहीं जरा इसका
फिर कर सकते उपभोग ।।
देख सके तुम यदि इसे
अंतर में आते जाते ।
पालक तुम पावक के बन
फिर कर सकते उपयोग ।।
फिर तुम क्रोध नहीं हो
ना तुम उसका हो ग्रास ।
स्वामी तुम जिसके
वह आज्ञाकारी दास ।।
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