रविवार, 11 अप्रैल 2021

पतझड़ का आखिरी पत्ता

मैं शाम तक निर्लज्ज सा
लटका अकेला वृक्ष पर ।
हूँ आखिरी यह सोच कर
मैं द्रवित तरू तन पर हुआ।
मुझको अभी अभिमान का
अतिशय जरा संज्ञान था।
कुछ हूँ हरा इस बात का
निश्चित अभी भी भान था।
मुझ बिन तेरी काया भी क्या
क्षण भर रूचिर रह पाएगी।
सावन की हरियाली भरी
डाली तुझे याद आएगी।
सूरज की किरणें सोख के
तुझको दिया पोषण बहुत।
अब जा रहा यह सोच कर
अश्रु हृदय न ला विटप।

मैं व्यर्थ तेरी सोचता
तू ठूंठ बस एक मूढ़ सा।
ना वेदना संवेदना
तू क्रूर हठी सा है खड़ा।
ना लेष तुझको रोष है
ना प्रेम मुझसे है जरा।
ले मैं चला अब तू मरा
अंतिम मिलन अपना हुआ।

तब धूल में मिलते किसी
पत्ते की सूखी डंठलें।
नयनों को दिखती रोज़ थीं
अब हृदय में चुभने लगी।
यह तना तो मुझसे नहीं
मैं ही इसी का भाग हूँ।
वह भूल ना जाए मुझे
अंतर में भय जागा तभी।
मैं पूजने उसको लगा
नत धरा को छू के हुआ।
यह सृष्टि का अंतिम चरण
मैं आखिरी जिसका नमन।
अब लुप्त सब हो जाएगा
सावन नहीं अब आएगा।
पतझड़ का मैं था आखिरी
पत्ता लिखा बस जाएगा। 

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