इन रस्तों पर हैं मोड़ बड़े
चौराहों तक ले जाते हैं |
कुछ टेढ़े हैं कुछ सीधे हैं
जो दूर दूर पहुंचाते हैं ||
कुछ नन्हे मुन्हे केवल बस
गलियों में जा खो जाते हैं |
इन रस्तों से एक मोड़ गया
तेरे घर के चौराहे तक ||
एक हरा भरा था पेड़ वहां
मैं छांव में जिसकी बैठ गया |
मंजिल अब भी थी, दूर जहाँ
रस्तों को भी मालूम कहाँ ||
तू एक मुसाफिर बन के तब
मेरे संग चलने को आया |
मंजिल पाने का रस्ता अब
रस्तों से साफ़ नज़र आया ||
रस्ते अब भी खो जाते हैं
कुछ गलियों से मिल जाते हैं |
पर मेरे जीवन के रस्ते
इन आँखों में दिख जाते हैं ||
चौराहों तक ले जाते हैं |
कुछ टेढ़े हैं कुछ सीधे हैं
जो दूर दूर पहुंचाते हैं ||
कुछ नन्हे मुन्हे केवल बस
गलियों में जा खो जाते हैं |
इन रस्तों से एक मोड़ गया
तेरे घर के चौराहे तक ||
एक हरा भरा था पेड़ वहां
मैं छांव में जिसकी बैठ गया |
मंजिल अब भी थी, दूर जहाँ
रस्तों को भी मालूम कहाँ ||
तू एक मुसाफिर बन के तब
मेरे संग चलने को आया |
मंजिल पाने का रस्ता अब
रस्तों से साफ़ नज़र आया ||
रस्ते अब भी खो जाते हैं
कुछ गलियों से मिल जाते हैं |
पर मेरे जीवन के रस्ते
इन आँखों में दिख जाते हैं ||
2 टिप्पणियां:
Bhahut sahi
एक टिप्पणी भेजें