हार का है हार तुझको
|
मिल गया तो क्या हुआ
||
व्यर्थ इनपर सोच कर
|
मत मति को अपनी तू फिरा
||
ध्यान करके स्वंय का |
तू दूरदृष्टि को जगा
||
सोच मत सब व्यर्थ है |
है मनुज संकट में पड़ा
||
और जाने राह में |
कितने ही दावानल मिलें
||
अरि मिलें अपने मिले
|
और शेष कभी, स्वंय ब्रह्म
मिलें ||
दानवों की भीड़ में |
गर स्वंय से तू डर गया
||
कौन पियेगा ये विष |
तूने भी गर पियूष पिया
||
धार करले खड्ग में |
और तीर तरकश में सजा
||
रुक नहीं कि शौर्य की
|
गाथा तुझे लिखनी अभी
||
कर पार्थ सी पैनी नज़र |
दे लक्ष्य अक्षु पे गडा
||
पौण्ड्र मुख से लगा कर
|
तू भीम सी कर गर्जना ||
हर वार कर इस वेग से
|
धूल धूसरित हो हर शिला
||
रख कदम इतनी जोर से
|
बैठे हृदय हर शत्रु का
||
लक्ष्य अंतिम रख हृदय में
|
हर जीत को तू दे भूला
||
मुस्करा हर मोड़ पर |
पर कदम आगे ही बढ़ा ||
और भूल न एक क्षण कभी
|
एकीकृत तन और मन रहें
||
कोई जो भूले राह इसमें
|
दूजा उसे जागृत करे
||
सृष्टि ने सबको नापकर |
झोली में भर कुछ पल दिए
||
है जीत उसकी धरा पर |
हर पल में जीवन जो जिये
||
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें