निर्द्वंद भाव से सय्यम
की |
बातें करता था रोज बड़ी
||
सोचा न कभी ये रूप धरे
|
अभिमान करेगा प्रवेश
यूँहीं ||
चमक भरी आँखों से |
मुस्काते से चेहरे को
मैं लिए ||
करने लगता अपमान यूँहीं
|
भरने लगता हुंकार यूँहीं
||
खुद को शुन्य बता कर
|
और कभी उपलब्धियां जता
कर ||
संयम की झूठी चादर ओढ़े
|
खुद को ही झुठलाता था
||
अपमान के डर से अपने
ही |
मैं संयम की धुरी घुमाता
था ||
कहता था स्वाभिमान जिसे
|
परदे में था अभिमान
वही ||
निर्मम की फिर ये कोशिश
है |
मैं चाहत से अब बच जाऊं
||
कर्तव्य विमुखता के भय
से |
सर्वत्र अज्ञात मैं हो
जाऊं ||
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