मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018

लम्हे

अलमारी की वो पुरानी डायरी 
कुछ किताबों में मोड़ कर रखी पर्चियां 

टटोल रहा हूँ बार बार 
इस फ़िराक में 
की तुमसे जो उस रोज़ 
नज़र से कह दिया था 
कहीं तो लिखा ही होगा 

अलमारी की वो पुरानी डायरी 
कुछ किताबों में मोड़ कर रखी पर्चियां 

ऐसे न जाने 
कितने ही लम्हे 
पहले भी पिरोएं हैं 
साथ में हमने 
लिखा भी है उनको 
पढता हूँ तो जैसे 
सांस लेते हैं 

हाँ सांसो पे 
कुछ कहा था शायद 
कागज़ में दफ़न 
न सही 
ज़िन्दा है 
धड़कता है वो लम्हा 
तेरे मेरे दरमियान 

कुछ तेरे ज़हन में 
कुछ मेरे ज़हन में 

अलमारी की वो पुरानी डायरी 
कुछ किताबों में मोड़ कर रखी पर्चियां 

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