बुधवार, 10 जुलाई 2019

हज़रतगंज की चाय


उस रोज़ दो लोगों से पहली बात हुई |
एक तुम और एक तुम्हारी चाय || 

उन आँखों में घुल गया था मैं  
बिन पिये ही जल गया था मैं

एक पल लगा की सौत साथ आई हो
अपने मिलन में काली रात आई हो

मुझसे ज्यादा तुम उस प्याले में खोई थी
हुनर कम था या किस्मत ही सोइ थी

न थी रंजिश न प्यार उस ज़हर से
मगर एक बार आया ये ज़ेहन में

गटक लूँ छीन के, बेशक्ल जालिम को,
दे दूँ मैं दोज़ख

न जाने क्या दिखा तुमको नहीं मुझमें
की उस प्याले की बातें ही लगी करने हमीं से

बड़ा खुदगर्ज़ था मैं सोच पीछे पछताया 
ये प्याला कुछ भी हो होठों पे पहला लफ्ज़ तो लाया

चाय अब भी नहीं पसंद है मुझे
बस प्याले में भर के छोड़ देता हूँ

फिर भी बड़ा शुक्रगुज़ार हूँ इसका ...

कभी तो जी करता है
ज़िन्दगी सुबह की चाय हो जाए

चुस्कियाँ लो तुम लबों से
नज़र का काम हो जाए
महक में तुम यूँही खोती रहो
मेरी सुबह की शाम हो जाए

ख़ुदा से मांग लूँ मोहलतें मैं एक लम्हे की
उम्र जिसकी मेरे प्याले के जितनी हो जाए

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