रविवार, 14 अप्रैल 2019

पानी की अभिलाषा



रोज कई गिलास
बिना सोचे हलक से उतार देते हो
अपनी ज़रूरत का बस एक सामान बना देते हो
सुकून दे सकूं तेरे गले और जुबां को मैं
मुझमें सोच ये न जाने क्या क्या मिलाते हो
खुद का रंग और तासीर भी मैं भूल जाता हूँ
मुझे उस मोड़ तक
न जाने क्यों मेरे रक़ीब लाते हो
कभी बैठो ज़रा समझो मुझे मेरी हक़ीक़त को
की मैं बेरंग हूँ बेशक्ल
पर जिंदादिल जवां हूँ मैं
सघन से वाष्प होने की मुसलसल दास्तान हूँ मैं
मैं हर जर्रे से कुछ न कुछ जरा एहसान लेता हूँ 
तेरे ही वास्ते खुद से मैं इतना काम लेता हूँ 

कभी बूंदे उतरते जिस्म में महसूस भी कर ले 
तेरी मेरी क़रीबी को मुक़्क़मल राब्ता देदे
मुझे मेरे ख़ुदा की शक्ल का दीदार पाना है 
मुझे मेरी इबादत का फ़ना कर फलसफा देदे

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