रोज कई गिलास
बिना सोचे हलक से उतार देते
हो
अपनी ज़रूरत का बस एक सामान
बना देते हो
सुकून दे सकूं तेरे गले और
जुबां को मैं
मुझमें सोच ये न जाने क्या
क्या मिलाते हो
खुद का रंग और तासीर भी मैं
भूल जाता हूँ
मुझे उस मोड़ तक
न जाने क्यों मेरे रक़ीब
लाते हो
कभी बैठो ज़रा समझो मुझे
मेरी हक़ीक़त को
की मैं बेरंग हूँ बेशक्ल
पर जिंदादिल जवां हूँ मैं
सघन से वाष्प होने की
मुसलसल दास्तान हूँ मैं
मैं हर जर्रे से कुछ न कुछ
जरा एहसान लेता हूँ
तेरे ही वास्ते खुद से मैं
इतना काम लेता हूँ
कभी बूंदे उतरते जिस्म में
महसूस भी कर ले
तेरी मेरी क़रीबी को मुक़्क़मल
राब्ता देदे
मुझे मेरे ख़ुदा की शक्ल का
दीदार पाना है
मुझे मेरी इबादत का फ़ना कर
फलसफा देदे
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