रविवार, 26 जुलाई 2020

आनंद का आयाम

अविचल अथिर सतह पर क्षीर के 
बैठा मनः को शांत कर निर्जीव मैं 

ब्रम्ह से जब प्रहर कुछ आगे बढ़ी 
ताप की छाया नरम सब पर पड़ी 
दोपहर तक प्राप्त सबको "मैं" हुआ 
अनवरत बूंदे कई वाष्पित हुईं 
मेघ में "अहं", तब विकसित हुआ 
वायु ने फिर दिशा दी एक अनकही

तड़ित झंझावात फिर बूंदे बनी 
हाय मेरी देह तो पानी हुई 
छूकर धरा, "अहं" फिर धूमिल हुआ 
क्षण मिला, जो द्वन्द से बाहर हुआ 

महि के उतंग हिम से तिरने लगी जो काया  
माया उदित अचेतन चेतन ने जन्म पाया 
उन्मत लगा मैं बहने प्लावन दिगंत होने 
दुर्जेय दीप्ति शापित अवसान निकट आया 
फिर मिट रहा विह्वल मैं, हाय क्यों काल आया

है कल्प जो क्षण भर नहीं मेरे लिए 
इसमें ही मुझको मोक्ष का संज्ञान है 
रुकना मगर संसृति का अपमान है 
हर पल में ही आनंद का आयाम है

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