अविचल अथिर सतह पर क्षीर के
बैठा मनः को शांत कर निर्जीव मैं
ब्रम्ह से जब प्रहर कुछ आगे बढ़ी
ताप की छाया नरम सब पर पड़ी
दोपहर तक प्राप्त सबको "मैं" हुआ
अनवरत बूंदे कई वाष्पित हुईं
मेघ में "अहं", तब विकसित हुआ
वायु ने फिर दिशा दी एक अनकही
तड़ित झंझावात फिर बूंदे बनी
हाय मेरी देह तो पानी हुई
छूकर धरा, "अहं" फिर धूमिल हुआ
क्षण मिला, जो द्वन्द से बाहर हुआ
महि के उतंग हिम से तिरने लगी जो काया
माया उदित अचेतन चेतन ने जन्म पाया
उन्मत लगा मैं बहने प्लावन दिगंत होने
दुर्जेय दीप्ति शापित अवसान निकट आया
फिर मिट रहा विह्वल मैं, हाय क्यों काल आया
है कल्प जो क्षण भर नहीं मेरे लिए
इसमें ही मुझको मोक्ष का संज्ञान है
रुकना मगर संसृति का अपमान है
हर पल में ही आनंद का आयाम है
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