क्षोभ नहीं अनुरोध हूँ मैं,
गतिरोध नहीं एक बोध हूँ मैं।
प्रकृति मां बस तेरी नहीं,
संतानों की सुध, सोच हूँ मैं।
रोष भी हूँ और हर्ष भी मैं
पाप भी हूँ और पुण्य भी मैं
अभिमान भी हूँ और भान भी मैं
अन्याय भी हूँ और न्याय भी मैं
रोग भी हूँ उपचार भी मैं
भय व्याप्त भी हूँ उत्साह भी मैं
संताप भी हूँ उल्लास भी मैं
हाँ कंस भी हूँ और कृष्ण भी मैं
रावण भी हूँ और राम भी मैं
अंतर मन के परिवर्तन का,
ईश्वर का एक सदुपाय हूँ मैं ।
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