मेरे पन्ने.......
यह Blog है मेरे जीवन से जुड़ी हुई कुछ अनुभूतियों को आप तक पहुचाने का माध्यम
मंगलवार, 21 सितंबर 2021
शनिवार, 11 सितंबर 2021
शनिवार, 7 अगस्त 2021
रविवार, 11 अप्रैल 2021
पतझड़ का आखिरी पत्ता
मैं शाम तक निर्लज्ज सा
लटका अकेला वृक्ष पर ।
हूँ आखिरी यह सोच कर
मैं द्रवित तरू तन पर हुआ।
मुझको अभी अभिमान का
अतिशय जरा संज्ञान था।
कुछ हूँ हरा इस बात का
निश्चित अभी भी भान था।
मुझ बिन तेरी काया भी क्या
क्षण भर रूचिर रह पाएगी।
सावन की हरियाली भरी
डाली तुझे याद आएगी।
सूरज की किरणें सोख के
तुझको दिया पोषण बहुत।
अब जा रहा यह सोच कर
अश्रु हृदय न ला विटप।
मैं व्यर्थ तेरी सोचता
तू ठूंठ बस एक मूढ़ सा।
ना वेदना संवेदना
तू क्रूर हठी सा है खड़ा।
ना लेष तुझको रोष है
ना प्रेम मुझसे है जरा।
ले मैं चला अब तू मरा
अंतिम मिलन अपना हुआ।
तब धूल में मिलते किसी
पत्ते की सूखी डंठलें।
नयनों को दिखती रोज़ थीं
अब हृदय में चुभने लगी।
यह तना तो मुझसे नहीं
मैं ही इसी का भाग हूँ।
वह भूल ना जाए मुझे
अंतर में भय जागा तभी।
मैं पूजने उसको लगा
नत धरा को छू के हुआ।
यह सृष्टि का अंतिम चरण
मैं आखिरी जिसका नमन।
अब लुप्त सब हो जाएगा
सावन नहीं अब आएगा।
पतझड़ का मैं था आखिरी
पत्ता लिखा बस जाएगा।
लटका अकेला वृक्ष पर ।
हूँ आखिरी यह सोच कर
मैं द्रवित तरू तन पर हुआ।
मुझको अभी अभिमान का
अतिशय जरा संज्ञान था।
कुछ हूँ हरा इस बात का
निश्चित अभी भी भान था।
मुझ बिन तेरी काया भी क्या
क्षण भर रूचिर रह पाएगी।
सावन की हरियाली भरी
डाली तुझे याद आएगी।
सूरज की किरणें सोख के
तुझको दिया पोषण बहुत।
अब जा रहा यह सोच कर
अश्रु हृदय न ला विटप।
मैं व्यर्थ तेरी सोचता
तू ठूंठ बस एक मूढ़ सा।
ना वेदना संवेदना
तू क्रूर हठी सा है खड़ा।
ना लेष तुझको रोष है
ना प्रेम मुझसे है जरा।
ले मैं चला अब तू मरा
अंतिम मिलन अपना हुआ।
तब धूल में मिलते किसी
पत्ते की सूखी डंठलें।
नयनों को दिखती रोज़ थीं
अब हृदय में चुभने लगी।
यह तना तो मुझसे नहीं
मैं ही इसी का भाग हूँ।
वह भूल ना जाए मुझे
अंतर में भय जागा तभी।
मैं पूजने उसको लगा
नत धरा को छू के हुआ।
यह सृष्टि का अंतिम चरण
मैं आखिरी जिसका नमन।
अब लुप्त सब हो जाएगा
सावन नहीं अब आएगा।
पतझड़ का मैं था आखिरी
पत्ता लिखा बस जाएगा।
गुरुवार, 8 अप्रैल 2021
गुरुवार, 1 अप्रैल 2021
रविवार, 31 जनवरी 2021
शनिवार, 23 जनवरी 2021
क्रोध
स्थान काल में छवियां सबकी,
होती एक अनेक ।
उन्हीं किसी में क्रोध नाम का,
होता है एक भेष ।।
क्रोध नहीं है विषय
खेद, द्वेष, चिंतन का ।
अलग नहीं अस्तित्व
धरा है तुमने वेष इसी का ।।
क्रोध नहीं है बाधा
ना ही इसका अपना रूप ।
अहम् की माटी में पलता
पाता यह उग्र स्वरूप ।।
करो क्रोध को धारण
तुम बनो नहीं खुद भोग ।
अचरज नहीं जरा इसका
फिर कर सकते उपभोग ।।
देख सके तुम यदि इसे
अंतर में आते जाते ।
पालक तुम पावक के बन
फिर कर सकते उपयोग ।।
फिर तुम क्रोध नहीं हो
ना तुम उसका हो ग्रास ।
स्वामी तुम जिसके
वह आज्ञाकारी दास ।।
होती एक अनेक ।
उन्हीं किसी में क्रोध नाम का,
होता है एक भेष ।।
क्रोध नहीं है विषय
खेद, द्वेष, चिंतन का ।
अलग नहीं अस्तित्व
धरा है तुमने वेष इसी का ।।
क्रोध नहीं है बाधा
ना ही इसका अपना रूप ।
अहम् की माटी में पलता
पाता यह उग्र स्वरूप ।।
करो क्रोध को धारण
तुम बनो नहीं खुद भोग ।
अचरज नहीं जरा इसका
फिर कर सकते उपभोग ।।
देख सके तुम यदि इसे
अंतर में आते जाते ।
पालक तुम पावक के बन
फिर कर सकते उपयोग ।।
फिर तुम क्रोध नहीं हो
ना तुम उसका हो ग्रास ।
स्वामी तुम जिसके
वह आज्ञाकारी दास ।।
मंगलवार, 29 दिसंबर 2020
शुक्रवार, 25 दिसंबर 2020
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