शनिवार, 2 नवंबर 2013

शाम

शाम ढले दरवाज़ा खोला,
सोचा,
कहो चाँद दिख जाए,
अरमान यही दिल में लेकर,
हम जीना चढ़ कर छत पर आए,
जब देखा ऊपर तो केवल,
बादल थे और कुछ पंछी,
लौट रहे थे शायद वो भी,
अपने वट से चाँद देखने |

वायु कितनी मद्धम थी,
सोचा,
कहो साथ में खुशबू  लाए,
अरमान यही दिल में लेकर,
हम छत के एक कोने में आए,
जब देखा उस ओर तो केवल,
एक वृक्ष था फूलों का,
सोच रहे थे वो भी शायद ,
कुछ रात बढे तो हम खिल जाएँ |

सामने वाली छत पर देखा,
सोचा,
शायद तुम दिख जाओ,
तभी हवा का एक झोंका सा,
खुशबू लेकर साथ में आया,
देखा ऊपर चाँद भी था,
बादल बीच बड़ा मुस्काया,
सोच रहे थे वो भी शायद,
तुम आओ तो रौनक आए |

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