शनिवार, 18 जनवरी 2014

R K G I T की कुछ यादें


डर भरा था हर हृदय में, कोई अपना था नहीं
सीनियर्स अरि तुल्य थे, और साथवाले अजनबी
फैकेल्टी ने “N F T E” का भय
था ह्रदय में भर दिया
सागर ने भी वार्डन के संग, जीना था दूभर कर दिया

हॉस्टल कैदखाना सरीखे, मेस भी चारागाह थी
थोड़ी तस्सल्ली देने को, संझा को मिलती चाय थी
एक रूम का कोना मिला, दरवाजे थे ना खिड़कियाँ
अलमारिया लदवा रहे, इंजीनियर्स ओन वर्क थे


कुछ दिन कटे.......

रूम सब सजते गए और बर्थडे मनते गए
थोड़े दिनों में अजनबी अच्छे बड़े लगते गए
सीनियर्स भी कटने लगे, राहों से अब हटने लगे
लेक्चररस भी सहमे से थे, कैसे नमूने लाये हो


कुछ पूछ लो तो पाप है, ये तो हमारे बाप हैं
उत्पात करते हैं नहीं, उत्पात के ये माप है


रात का एक दृश्य.........

भट्टे के सन्नाटे में जब बिजली कभी कट जाती थी
हॉस्टल के अँधेरे में तब, कुछ राष्ट्रभक्त जग जाते थे
सन्नाटे में मर मिटने की, हुंकारें भरते जाते थे
अंग्रेजों से न बैर कोई, स्वामी से न याराना था
बस मौका था चिल्लाने का, सागर की वाट लगाने का



ऐसे ही जाने कितने पल यादों में सबकी घुले हुए
दोहराने का मौका शायद ये कविता मुझको दे पाए

4 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

Wah mere Kaviraj...wah!

rajneesh ने कहा…

bhbai bhaut mast.....aashu aa gaye, jaise sab kuch nazar ke saame dikha ne laga...mast keep it up

Alok ने कहा…

Waaah ........:)

Unknown ने कहा…

वाह मेरे भाई ........