आज मिला एक काम
पेंशन की कुछ पुरानी
फाइलें पलटने का
थे फटे हुए पन्ने जिसके
जिसके थे शब्द भी साफ़
नहीं
पन्ने वो वृद्ध सरीखे
थे
मटमैले और कुछ पीले थे
आकुल थे वो मिट जाने
को
मिट्टी में ही खो जाने
को
एक डोर संजोए थी उनको
शायद यादों की डोरी थी
जो खुलती थी कुछ लेने
को
वृद्धों को यौवन देने
को
पर जब मैंने पन्ने खोले
उन पन्नो के सीनों पर
निपुड हस्त से खींचे
हुए
कुछ शब्द दिखे
थे सालों पहले दफ्न हुए
पर आज गवाही देते हैं
निर्भयता और सरलता से
उन बूढ़े पन्नो के, यौवन
की
ह्रदय को जो अकुलाते
हैं
आँखों को नम कर जाते
हैं
मष्तिष्क में बारम्बार
मेरे
फिर प्रश्न एक दोहराते
हैं
हो सकेंगे पैदा क्या
ये सुर
नवयुग के टंकित शब्दों
से
मेरी पेंशन की फाइल भी
क्या मृत होगी ?
या होगा उसमे भी
स्याह रक्त
कुछ जीवित लकीरे
और एक डोर
जो साँसों की तरह ही
यादों को संजोए रक्खेगी
और फिर एक दिन
एक ऑफिसर
पलटेगा उसके झूलते हुए पन्नो को
और वृद्धों को
वात्सल्य भरा एक पृष्ठ देगा
मृत धरा पर उस किसीने
भाव जीवन में दिए
क्यों उसी जीवन के रस
को हमने दूषित कर दिया
4 टिप्पणियां:
Sahi jaa rahe ho.......lage raho
Sahi jaa rahe ho.......lage raho
Waah bhai...hridaya sparshit avum marmit bhaav hai yeh..bahut sahi likh rahe ho bhai...
Sunder ati sunder...
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