शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

वैलेंटाइन डे की पूर्व संध्या पर लिखी कुछ पंक्तियाँ

इन रस्तों पर हैं मोड़ बड़े
चौराहों तक ले जाते हैं  |
कुछ टेढ़े हैं कुछ सीधे हैं
जो दूर दूर पहुंचाते हैं ||
कुछ नन्हे मुन्हे केवल बस 
गलियों में जा खो जाते हैं |

इन रस्तों से एक मोड़ गया
तेरे घर के चौराहे तक ||
एक हरा भरा था पेड़ वहां 
मैं छांव में जिसकी बैठ गया |
मंजिल अब भी थी, दूर जहाँ
रस्तों को भी मालूम कहाँ ||

तू एक मुसाफिर बन के तब 
मेरे संग चलने को आया |
मंजिल पाने का रस्ता अब
रस्तों से साफ़ नज़र आया ||

रस्ते अब भी खो जाते हैं
कुछ गलियों से मिल जाते हैं |
पर मेरे जीवन के रस्ते 
इन आँखों में दिख जाते हैं ||

2 टिप्‍पणियां:

Shailesh ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Alok ने कहा…

Bhahut sahi