सोमवार, 4 जुलाई 2016

अनजान फ़रिश्ता

तुम्ही हमसे मिले हो एक अनजाने फ़रिश्ते से |
हमें तो दूर से ही दर तेरा वो साफ़ दिखता है ||

तेरे गालों की लाली से ही मेरी प्रात होती है |
तेरे माथे पे सूरज सी चमक में दिन कटे मेरा ||  
तेरी वो गुनगुनी सी हर हंसी कानों में बसती है |
तेरे हांथों की नरमी भी मेरे हाथों में रहती है ||  
तेरी आँखों के काजल में ही हमको ख़्वाब दिखते हैं |  
तेरी पलकों के साए में ही ढलती शाम है मेरी ||
तेरी ये जुल्फ है बादल की जिसमें भीगता हूँ मैं |
ये सारे रूप हैं जिसमें तू मेरे साथ रहती है ||

खुदा को देखकर फिर भी दुआ में हाथ उठते हैं |
की उनको शौक से शौक़ीन मेरा है बना डाला ||

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