प्रकृति प्रेरित
सत्य,
मिथ्या ज्ञात
मुझको |
है कौन यह
अज्ञात मुझको |
मेरी रचना है
यही एहसास मुझको |
बनेगा पहचान यह
मेरी कभी
अदृश्य कल के
बिम्ब का आभास
मुझको |
अनकही इच्छाओं का
है जन्मदाता |
पूर्ण होने पर
फलित,
अहंकार दाता |
हार जाने पर
जो जन्में क्रोध
इसमें |
बिम्ब का तब अक्स
मुझको याद आता |
न ये मुझसे था
न मेरा |
स्वयं से निर्मित
खुद को ही पाने |
सत्य से रूठे
हृदय को फिर
मनाने |
संसार में प्रेम
का
दीपक जलाने |
खिलेगा ये पुष्प
अंतर की लगन से |
और अर्पित
यज्ञ की ज्योति
में होगा |
प्राप्त होगा
ब्रंह
हर्षित शून्य
होगा |
तब मेरा कर्तव्य
थोड़ा पूर्ण होगा |
1 टिप्पणी:
Bhai,zabardast hi hoga, samajh to aai nahin.....
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