गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

है कौन यह


प्रकृति प्रेरित सत्य,

मिथ्या ज्ञात मुझको |

है कौन यह

अज्ञात मुझको |

मेरी रचना है

यही एहसास मुझको |

बनेगा पहचान यह

मेरी कभी

अदृश्य कल के

बिम्ब का आभास मुझको |

अनकही इच्छाओं का

है जन्मदाता |

पूर्ण होने पर फलित,

अहंकार दाता |

हार जाने पर

जो जन्में क्रोध इसमें |

बिम्ब का तब अक्स

मुझको याद आता |

न ये मुझसे था

न मेरा |


स्वयं से निर्मित

खुद को ही पाने |

सत्य से रूठे

हृदय को फिर मनाने |

संसार में प्रेम का

दीपक जलाने |

खिलेगा ये पुष्प

अंतर की लगन से |

और अर्पित

यज्ञ की ज्योति में होगा |


प्राप्त होगा ब्रंह

हर्षित शून्य होगा  |

तब मेरा कर्तव्य

थोड़ा पूर्ण होगा |

1 टिप्पणी:

MD ASDULLAH NAZ ने कहा…

Bhai,zabardast hi hoga, samajh to aai nahin.....