गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

मध्यमवर्गी सिपाही

मेरी यह कविता समर्पित है स्वर्गीय संतोष कुमार (पूर्व वायुसेना कर्मचारी), SWO, कारपोरेशन बैंक, खैरा शाखा, को जो १३ अक्टूबर को सामाजिक प्रदूषण  की भेंट चढ़ गए | 

एक और सिपाही गिर गया 
पर किसे फर्क पड़ता है | 
हुक्मरानों को तो 
वोट बैंक दिखता है ||

किस्मत ही ख़राब रही होगी 
वरना "शहीद" कहलाता | 
इन्ही नेताओं से 
तोपों की सलामी पाता || 

न थी जाति न कोई धर्म उसका 
न वो सबला ही था | 
न अमीर से नाता उसका 
न वो गरीब ही था उस स्तर का || 

मतदाता था वो भी मध्यमवर्गी | 
चीखना भी जिसे नहीं आता || 

कर पे जिसके राष्ट्र चलता है | 
कर से जिसके राष्ट्र बनता है || 

मांगना भी जिसे नहीं आता | 
भीड़ में भी भीड़ से अलग है जो || 

वो तो अर्जुन है कुरुक्षेत्र में बैठा जैसे | 
कृष्ण को आकर बस अब पार्थ को उठाना है || 

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

Sachayi yehi hai...
Bahut khub

Unknown ने कहा…

बहुत ही मार्मिक कविता गौरव जी।