मेरी यह कविता समर्पित है स्वर्गीय संतोष कुमार (पूर्व वायुसेना कर्मचारी), SWO, कारपोरेशन बैंक, खैरा शाखा, को जो १३ अक्टूबर को सामाजिक प्रदूषण की भेंट चढ़ गए |
एक और सिपाही गिर गया
पर किसे फर्क पड़ता है |
हुक्मरानों को तो
वोट बैंक दिखता है ||
किस्मत ही ख़राब रही होगी
वरना "शहीद" कहलाता |
इन्ही नेताओं से
तोपों की सलामी पाता ||
न थी जाति न कोई धर्म उसका
न वो सबला ही था |
न अमीर से नाता उसका
न वो गरीब ही था उस स्तर का ||
मतदाता था वो भी मध्यमवर्गी |
चीखना भी जिसे नहीं आता ||
कर पे जिसके राष्ट्र चलता है |
कर से जिसके राष्ट्र बनता है ||
मांगना भी जिसे नहीं आता |
भीड़ में भी भीड़ से अलग है जो ||
वो तो अर्जुन है कुरुक्षेत्र में बैठा जैसे |
कृष्ण को आकर बस अब पार्थ को उठाना है ||
एक और सिपाही गिर गया
पर किसे फर्क पड़ता है |
हुक्मरानों को तो
वोट बैंक दिखता है ||
किस्मत ही ख़राब रही होगी
वरना "शहीद" कहलाता |
इन्ही नेताओं से
तोपों की सलामी पाता ||
न थी जाति न कोई धर्म उसका
न वो सबला ही था |
न अमीर से नाता उसका
न वो गरीब ही था उस स्तर का ||
मतदाता था वो भी मध्यमवर्गी |
चीखना भी जिसे नहीं आता ||
कर पे जिसके राष्ट्र चलता है |
कर से जिसके राष्ट्र बनता है ||
मांगना भी जिसे नहीं आता |
भीड़ में भी भीड़ से अलग है जो ||
वो तो अर्जुन है कुरुक्षेत्र में बैठा जैसे |
कृष्ण को आकर बस अब पार्थ को उठाना है ||
2 टिप्पणियां:
Sachayi yehi hai...
Bahut khub
बहुत ही मार्मिक कविता गौरव जी।
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