शनिवार, 8 दिसंबर 2018

नन्ही प्रेरणा


आज जब सब एक जैसा लग रहा था, एक नन्ही सी जान को देख कर सब जीवंत हो उठा, प्रेरणा से भरे उस पल को शब्दों में पिरोने का निर्मम का एक प्रयास |




शब्द नहीं थे मेरे ज़हन में
बारूद की आखिरी खुरचन भी जल चुकी थी
तभी क्यारी से किसी लम्हे की
खिलखिलाती आहट ने मुझे थपकी दी
वहां गुलाब की हरी टहनी पर
नारंगी सूरज की खुशबू  को
कोई अपनी नरम आँखों से चख रहा था
पर मेरी आँखों तो आज बेरंग थीं 
फिर भी
मुझे उस इकाय की रंगीन झीलों में
रोज़ नए रंग के सपने सच होते दिखते थे
वो झूठी माया में रंग देख लेता
और मैं उसके रंग में अपनी ख़ुशी
दोनों की उम्र और दूरियां बढ़  रहीं थी
वो शनैः शनैः बड़ा हो रहा था
और मैं धीरे धीरे बच्चा
बहुत कुछ मिलता था उस चमक में
जो उसकी मासूमियत से आती थी
कुछ रंग चुरा कर ज़हन में
भर लिए हैं
कल फिर उन्हें कागज़ में पिरोने के लिए

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