रविवार, 9 दिसंबर 2018

अनोखा एहसास


सूखते होठ
कांपते हाथ
बैठता सा दिल,
जैसे ऊन की गेंद सा महसूस हो रहा हो |
कान जैसे बंद हों,
भीतर की आवाज़ें और साफ़ हो गईं हों |
सांसों का चढ़ना उतरना,
नसों में खून का एक एक कतरा,
उसकी हर फड़कन |
जैसे कुछ गूँज रहा हो |
आँखें खुलना चाह कर भी बंद होने को
बेताब हों जैसे |
सूखता गला जिसे पानी भी
काँटों सा लगता हो |
पसीना माथे से टपकते हुए
सुकून दे रहा हो जैसे |
सपनों के दौर पर दौर
हर पहर में आते हों,
और हर सपना एक सिरे से दूसरे सिरे तक
ज़हन में भर गया हो |
ख़ुशी इतनी जल्दी आंसुओं के रूप में बयान होती
इसी हाल में दिखती है, 
और गुस्सा भी मुट्ठी की भींच में
सिमट के सूखे तिनके सा 
महसूस होता है |
कहते हैं इस हाल में सोचना बड़ा मुश्किल होता है, 
इसीलिए शायद आज कुछ सूझ नहीं रहा है |
बयां हो रहा है वो पल,
जिसे चाहे अनचाहे मेरा जिस्म जी रहा है
और मन बेताब सा उसमें भी जाने क्या कुरेद रहा है
और मैं दोनों को भीनी मुस्कान लिए
समझा रहा हूँ की
बुखार पर थोड़ा तो रहम कर लो |


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