एक बुझा हुआ चेहरा देखा |
कोने में था बैठा घुम सा ||
मैंने हिम्मत की और पास गया |
कुछ बोला और कुछ मुस्काया ||
भौएँ
उनकी कुछ तन सी गई |
थी
ख़ामोशी भी थम सी गई ||
अब
हम चुप थे और वो चालू |
वो
चाक़ू थे और हम आलू ||
शब्दों में थे कटु व्यंग भरे |
गालियों से भरे रस छंद लिए ||
वो तिनका थे हम चिंगारी |
अब वो दावानल हम सूखी डाली ||
मुस्कान
टिकाए होठों पर |
आँखों
की चमक बुझती सी दिखी ||
अब
मुश्किल था पीछे हटना |
पर
सुनना भी आसान नहीं ||
जब प्राण लगे संकट में फंसे |
वो बोले अब मैं चलता हूँ ||
इश्वर ने चाहा अगर कभी |
मिलकर दो बातें करता हूँ ||
सुधर
न पाया फिर भी मैं |
आदत
से था मजबूर बड़ा ||
फिर
देख किसी गुमसुम को मैं |
ललचाया
और कुछ पास गया ||
पर रुई के अब गोले दो |
कानों में भर कर जाता हूँ ||
मुस्काता हूँ हर्षाता हूँ ||
दोनों का समय बिताता हूँ ||
2 टिप्पणियां:
Ye wali achi h
Ye wali achi h
एक टिप्पणी भेजें