गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

बेवजह

फिर क़लम जगी है हाथों में |
पन्नों पर प्यादे घोलूँगा ||
फुरसत के खाली खानों में | 
शतरंज सी स्याही खेलूंगा ||
पर क़लम मेरी, मेरी ही सही | 
कुछ और चाल चल देती है ||
मैं सोज़ सोच कर आता हूँ |
एहसासों से भर देती है ||
एहसान क़लम का कागज़ पर |
अल्फ़ाज़ न जाने किसके हैं ||
निर्ममता से निर्मम देखो |
बेवजह वजह है बन बैठा ||

5 टिप्‍पणियां:

Greengold ने कहा…

👌👌👌👌

Unknown ने कहा…

Yaar cha gaye tum
MindblowingMi

Unknown ने कहा…

👏👏👏🙏

Unknown ने कहा…

Bahut khub beta....

Govindsing ने कहा…

Really it's beautiful presentation of feelings in form of poetry
Composed well