फिर क़लम जगी है हाथों में |
पन्नों पर प्यादे घोलूँगा ||
फुरसत के खाली खानों में |
शतरंज सी स्याही खेलूंगा ||
पर क़लम मेरी, मेरी ही सही |
कुछ और चाल चल देती है ||
मैं सोज़ सोच कर आता हूँ |
एहसासों से भर देती है ||
एहसान क़लम का कागज़ पर |
अल्फ़ाज़ न जाने किसके हैं ||
निर्ममता से निर्मम देखो |
बेवजह वजह है बन बैठा ||
पन्नों पर प्यादे घोलूँगा ||
फुरसत के खाली खानों में |
शतरंज सी स्याही खेलूंगा ||
पर क़लम मेरी, मेरी ही सही |
कुछ और चाल चल देती है ||
मैं सोज़ सोच कर आता हूँ |
एहसासों से भर देती है ||
एहसान क़लम का कागज़ पर |
अल्फ़ाज़ न जाने किसके हैं ||
निर्ममता से निर्मम देखो |
बेवजह वजह है बन बैठा ||
5 टिप्पणियां:
👌👌👌👌
Yaar cha gaye tum
MindblowingMi
👏👏👏🙏
Bahut khub beta....
Really it's beautiful presentation of feelings in form of poetry
Composed well
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